Sunday, October 25, 2020
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वास्तुशास्त्र से सम्बंधित उपयोगी टोटके (Useful tricks related to Vastu Shastra)

प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन आनन्दमयी सुखी व समृद्ध बनाने में हमेशा लगा रहता है। कभी कभी बहुत अधिक प्रयास करने पर भी वह सफल नही हो पाता है। ऐसे में वह ग्रहशांति, ईष्ट देवी देवताओं की पूजा अर्चना करता है। परन्तु उससे भी उसको इसके अनुरूप फल प्राप्त नही होता है। वह अपने भाग्य को कोसता है और कहता है शायद मेरे भाग्य में कुछ ऐसा ही लिखा हुआ है।

जैसा कि सब जानते हैं कि भाग्य और वास्तु का गहरा संबंध है यदि आपकी कुंडली उत्तम है और यदि घर में कुछ त्रुटियां हैं तो मनुष्य उतनी प्रगति नही कर पाता जितनी करनी चाहिए। अर्थात मनुष्य की समृद्धि में भाग्य एवं वास्तु का बराबर बराबर का संबंध होता है।

ग्रह देवी देवताओं की पूजा अर्चना और प्रयत्नों के अतिरिक्त भी मनुष्य को एक विषय पर और ध्यान देना चाहिए और वह है उसके घर एवं दुकान की वास्तु। वास्तु दोष निवारण करने से मनुष्य के जीवन में पूर्ण रूप से लाभ प्राप्त होता है। घर का निर्माण इस प्रकार करें जो प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप हो तो वह मनुष्य प्राकृतिक ऊर्जा स्त्रोतों के माध्यम से अपने कल्याण हेतु उपयोग कर सकता है।

वास्तु अनुसार निर्माण कार्य वर्तमान समय में अत्यावष्यक हो गया है। क्योंकि निर्माण के पष्चात् आदि वास्तु दोष निकले और तब मकान में तोड़ फोड़ करनी पड़े तो वह अत्यंत कष्टकारक होता है। आर्थिक बोझ भी बड़ जाता है। अतः उसका ध्यान रखकर भवन निर्माण करें तो वास्तुदोष से बच सकते है।

जन्मकुंडली के ग्रहों की प्रकृति व स्वभाव के अनुसार सृजन प्रक्रिया बिना लाग-लपेट के प्रभावी होती है और ऐसे में अगर कोई जातक जागरूकता को अपनाकर किसी विद्धान वास्तुकार से पराम्र्य कर अपना वास्तु ठीक कर लेता है, तो वह समृद्धि प्राप्त करने लगता है। बने भवनों एवं नवनिर्माण होने वाले भवनों में वास्तुदोष निवारण का प्रयास करना चाहिए बिना तोड़ फोड़ के प्रथम प्रयास में दिशा परिवर्तन कर अपनी दिशा को बदलने का प्रयास करें। यदि इसमें सफलता नही मिलें तो पिरामिड एवं फेंगसुई सामग्री का उपयोग कर ग्रह क्ले्य से मुक्ति पाई जा सकती है। संक्षेप में कहाँ क्या होना चाहिए।

दक्षिण व पष्चिम में भारी निर्माण होना उचित है। इससे तरक्की होती है।

उत्तर पूर्व में सड़क व पार्क होने पर भी तरक्की, खु्यहाली के योग अपने आप बनते रहेंगे।

अगर मुख्य द्वार उत्तर पूर्व में हो तो अच्छे हैं। दक्षिण दक्षिणपष्चिम में हो तो अगर उसके सामने
ऊँचे व भारी निर्माण होगा तो भी भारी तरक्की के आसार बनेंगे, पर शर्त यह है कि उत्तर-पूर्व में कम ऊँचाई के हल्के निर्माण ही तरक्की देंगे।

यदि संभव हो तो घर के बीच में आंगन अवष्य छोड़े एवं उसे बिल्कुल साफ-स्वच्छ रखना चाहिए। इससे घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

भवन में कांटेदार वृक्ष एवं पेड़ नही होने चाहिए न ही दूध वाले पौधे- कनेर, आंकड़ा, केक्टस, बौसांई आदि। इसके स्थान पर सुगन्धित एवं खूबसूरत फूलों के पौधे लगाने चाहिए।

घर में युद्ध के चित्र, बन्द घड़ी, टूटे हुए कांच, तथा शयन कक्ष में पलंग के सामने दर्पण या डेसिंग टेबिल नही होना चाहिए।

घर में खिड़कियों की संख्या सम और सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए।

भवन के मुख्य द्वार में दोनों तरफ हरियाली वाले पौधें जैसे तुलसी और मनीप्लांट आदि रखने चाहिए। फूलो वाले पौछे सामने वाले आंगन में ही लगायें। घर के पीछे होने से मानसिक कमजोरी को बढ़ावा मिलता है।

मुख्य द्वार पर मांगलिक चिन्ह जैसे स्वास्तिक, ‘’ आदि अंकित करने के साथ साथ गर्पिति लक्ष्मी या कुबेर की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

मुख्य द्वार के सामने मन्दिर नही होना चाहिए। मुख्य द्वार की चैड़ाई हमेशा लम्बाई की आधी होनी चाहिए।

मुख्य द्वार के समक्ष वृक्ष, स्तम्भ, कुंआ तथा जल भंडारण नही होना चाहिए। मुख्य द्वार के सामने कूड़ा करकट नही होने देना चाहिए। यह अअशुभ और दरिद्रता का प्रतीक है।

हमेशा रसोई आग्नेय कोण या दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए। गैस सिलेण्डर व अन्य अग्नि के स्त्रोतों तथा भोजन बनाते समय ग्रहणी की पीठ रसोई के दरवाजे की तरफ नही होनी चाहिए।
रसोईघर हवादार एवं रो्यनीयुक्त होनी चाहिए। रेफ्रिजरेटर के ऊपर टोस्टर या माइक्रोवेव या ओवन न रखें। रसोई में चाकू स्टैएण्ड पर खड़ा नही होना चाहिए। झूठे बर्तन रसोई में नही रखें होने चाहिए। खासतौर पर रात के समय। सारे बर्तनों को साफ करके रसोई में रखने चाहिए। घर में उन्नति होती है।

पति पत्नी के मध्य गृह क्लेश शांत करने के सामान्य उपाय (Pati Patne ke madhy grh klesh shant karane ke achook upay)

ड्राइंग रूम उत्तर दिशा में होना चाहिए। टी.वी., टेलीफोन व अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरण दक्षिण दिशा में रखें। दीवारों पर कम से कम कीले प्रयुक्त करें। भवन में प्रयुक्त फर्नीचर पीपल, बड़ अथवा बहेड़े के वृक्ष की लकड़ी का नही होना चाहिए।

किसी कोने में अधिक पेड़ एवं पौधे ना लगाऐं इसका दुष्प्रभाव माता पिता पर भी हो सकता है।

घर का मुख्य द्वार छोटा हो तथा पीछे का दरवाजा बड़ा हो तो वहाँ के निवासी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर सकते हैं।

घर का प्लास्टर उखड़ा हुआ नही होना चाहिए चाहे वह आंगन का हो, दीवारों का या रसोई अथवा शयनकक्ष का हो। दरवाजे एवं खिड़कियां भी क्षतिग्रस्त नही होनी चाहिए। मुख्य द्वार का रंग काला नही होना चाहिए। अन्य दरवाजों और खिड़कियों का रंग काला नही होना चाहिए। इसका अर्थ है काला रंग न किसी दरवाजे और न ही खिड़कियों पर होना चाहिए।

मुख्य द्वार पर कभी दर्पण नही लगाना चाहिए। सूर्य के प्रकाश की और कभी भी काँच न रखें। इस
काँच का परिवर्तित प्रका्य आपका वैभव एवं ऐष्वर्य नष्ट करता है।

घर एवं कमरे की छत सफेद होनी चाहिए। इससे ऊर्जावान बना रहता है।

भवन में सीढियाँ पूर्व से पष्चिम या दक्षिण अथवा पष्चिम दिशा में उत्तम रहती हैं। सीढ़ियां कभी भी द्वार पर नही होनी चाहिए। सीढ़ियों के नीचे का स्थान हमेशा साफ रखना चाहिए तथा वहाँ बैठकर कोई महत्वपूर्ण कार्य नही करना चाहिए वह कार्य पूरा नही होता है।

पानी का टैंक पश्चिम में उपयुक्त रहता है। भूमिगत हैण्डपम्प या बोरिंग ई्यान(उत्तर पूर्व) दिशा में होने चाहिए। हैंड टैंक के लिए उत्तर और वाक्य कोण (दिशा; उत्तर-पष्चिम) के स्थान पर रखना चाहिए। टैंक का ऊपरी हिस्सा गोल होना चाहिए।

शौचालय की दिशा उत्तर दिशा में होनी चाहिए। या इसे प्रयुक्त करने वाले का मुँह दक्षिण में व पीठ उत्तर दिशा में होनी चाहिए। मुख्य द्वार के बिल्कुल समीप शौचालय न बनायें। सीढ़ियों के नीचे शौचालय का निर्माण कभी नही करवायें यह लक्ष्मी का मार्ग अवरूद्ध करता है ।शौचालय का द्वार बंद रखना चाहिए। उत्तर दिशा, ई्यान, पूर्व दिशा एवं आग्नेय कोण में शौचालय या टैंक निर्माण कदापि नही करना चाहिए।

भवन की दीवारों पर आई सीलन व दरारें आदि जल्दी ठीक करवा लेनी चाहिए। क्योंकि यह घर के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नही रहती।

घर के सभी उपकरण जैसे टी.वी, फ्रिज, घड़ियां, म्यूजिक सिस्टम, कम्पयूटर आदि चलते रहना चाहिए। खराब होने पर इन्हें तुरंत ठीक करवा लें क्योंकि खराब उपकरण घर में होने अशुभ होते है।

भवन का ब्रह्म स्थान रिक्त होना चाहिए। इसका भवन के मध्य कोई निर्माण कार्य नही करना चाहिए।

बीम के नीचे न तो बैठे और न ही शयन करें। शयनकक्ष, रसोई एवं भोजन कक्ष बीम रहित होने चाहिए।

वाहनों हेतु पार्किंग स्थल आग्नेय दिशा में उत्तम रहते हैं क्योंकि ये सभी उष्मीय ऊर्जा द्वारा चलते हैं।

भवन के दरवाजें व खिड़कियां न तो आवाज करने वाले होने चाहिए और न ही स्वतः खुले तथ बंद होने चाहिए।

व्यर्थ की सामग्री(कबाड़) को एकत्र न होने दें। घर के सामान को अस्त व्यस्त न रखें। अनुपयोगी वस्तुओं को घर से निकालते रहने चाहिए।

भवन के प्रत्येक कोने में प्रका्य व वायु का सुगमता से प्रवे्य होना चाहिए। अशुद्ध वायु आने व अशुद्ध वायु बाहर निकलने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। ऐेसे होने से छोटे मोटे वास्तु दोष स्वतः समाप्त हो जाते है।

दुकान में वायव्य दिशा का विशेष ध्यान रखना चाहिए अपना सेल काउंटर वायव्य दिशा में रखें, किंतु तिजौरियों एवं स्वयं के बैठने का स्थान नैत्रचत्य दिशा में रखें, इनका मुख उत्तर या ई्यान की ओर होना चाहिए।

भवन के वायव्य कोण में कूलर या ए.सी. को रखना चाहिए जबकि नैत्रचत्य कोण में भारी अलमारी को रखना चाहिए। वायव्य दिशा में स्थायी महत्व की वस्तुओं को कभी भी नही रखना चाहिए।

घर का मुख्य द्वार किसी अन्य के मुख्य द्वार के सामने नही होना चाहिए। घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाना अति अशुभ होता है तथा घर का कुछ भाग मिट्टी वाला होना चाहिए या 12 से 15 गमले पौधे वाले होने चाहिए।

ई्यान कोण किसी भी घर का मुख स्थान कहा जाता है। इसलिए इस कोने को सदा स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहिए।

रसोईघर मुख्यदार के ठीक सामने नही बनाना चाहिए। पूजाघर, रसोई एवं शौचालय को पास पास नही होना चाहिए।

किसी भी घर में दरवाजों व खिड़कियां ग्राउंड लोर पर ही अधिक रहने चाहिए, उसके बाद ऊपर के लोंरों पर कम करते जाना चाहिए।

बच्चों के अध्ययन की दिशा उत्तर या पूर्व होनी चाहिए। यदि बच्चे इन दिशाओं की ओर मुख करके अध्ययन करते हैं तो स्मृति बनी रहती है।

घर में पौधें लगाते समय उसमें सांभर नमक अथवा सैंधा नमक डाल दें इससे कीटाणु पैदा नही होते हैं।

जल निकास सदा उत्तर या पूर्व में रखें।

अगर घर में कई घड़ियां है और वे ठीक से नहीं चल रही है तो उन्हें तुरन्त ठीक करायें, क्योंकि
घड़ियाँ ग्रहस्वामी के भाग्य को तेज या मंदा करती है।

पति पत्नि में माधुर्य संबंधों के लिए शयन कक्ष के नैत्रचत्य कोर्(िदक्षिर्-िपष्चिम) में प्रेम व्यवहार करते पक्षियों का जोड़ा रखना चाहिए।

सोते समय सिरहाना उत्तर या पष्चिम में रखने से रोग उत्पन्न होते है। पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या, दक्षिणकी ओर रखने से धन व आयु की बढ़ोतरी होती है। उत्तर की ओर सोने से आयु की हानि होती है। विद्यार्थियों को सदैव पूर्व की ओर सिर करके तथा अन्य सदस्यों को दक्षिणकी ओर सिर करके सोना चाहिए।

अन्नभण्डार, गौ्याला, रसोईघर, गुरूस्थल व पूजा स्थल जहाँ हो उसके ऊपर ्ययन स्थान नही होना चाहिए। वहाँ शयन कक्ष होगा तो धन संपदा का ना्य हो जाता है।

सूर्योदय के समय पूर्व दिशा में व सूर्यास्त के समय पष्चिम दिशा में मलमूत्र विसर्जन करने से सिर का रोग होता है।

घर में बड़ी बड़ी मूर्ति नही रखनी चाहिए। इसकी अधिकतम लंबाई ग्रहस्वामी के बारह अंगुल बराबर होनी चाहिए।

पूजाघर में किसी देवता की एक से अधिक नही होनी चाहिए।

पूर्व की ओर मुँह करके भोजन करने से आयु, दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करने से प्रेम, उत्तर की ओर मुँह करके भोजन करने से रोग की प्रप्ति होती है।

घर के प्रवे्यद्वार पर नीबू या संतरे का पौधा लगाने से घर में सम्पदा की वृद्धि होती है।

घर के अग्नेय कोर्(िदक्षिर्-िपूर्व) में धातु का कटोरा रखें और उसमें जो मार्ग में पड़े हुए सिक्के मिले उन्हें डालते रहना चाहिए, ऐसा करने से घर में अचानक धन आगमन होने लगता है।

घर में पौछा व झाड़ू खुले स्थान पर ही रखें। खासकर भोजन कक्ष में कभी नही रखना चाहिए, इससे अन्न व धन की हानि होती है। रात का झाड़ू को बिस्तर के नीचे नही रखना चाहिए, ऐसा करना बीमारी को न्यौता देना जैसा होता है।

शौच से निवृत होने के बाद शौचालय का द्वार बन्द कर दें। यह नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

घर के ड्राइंगरूम मेें परिवार के सदस्यों का सामूहिक हँसमुख चित्र लगायें तथा दिन में एक समय परिवार के सदस्यों को एक साथ भोजन करना चाहिए। इससे परस्पर संबंधों में प्रेम बढ़ता है।

अगर घर का मुख्य द्वार दक्षिर्-िपष्चिम भाग का कोना भरा हुआ है तो घर में बीमारियां बार बार आती है। यदि इस क्षेत्र में कोई तहखाना हो तो उसका कुप्रभाव पड़ता है। दक्षिर्-िपष्चिम भाग पर मार्ग प्रहार भी गलत रहता है। इसका दाम्पत्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः इन कमियों को सुधारकर दाम्पत्य जीवन में मधुरता लाई जा सकती है।

भवन के उत्तर पूर्वी भाग में शौचालय होने पर आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। कई बार तो पति पत्नि में तलाक की स्थिति आ जाती है या मुकद्दमे बाजी से धन हानि संभव है।
रसोईघर, ऊँचा चबूतरा या कोणकटा हुआ हो तो भी दाम्पत्य सुख नही मिलता है। इस क्षेत्र में
पूजाघर, पानी का कुण्ड अच्छा रहता है। यह कोणअगर बडा़ हुआ तो अशुभ रहता है। इस कोणका मार्ग प्रहार भी अशुभ होता है।

भवन के दक्षिर्-िपूर्वी कोने में यदि पानी का कुंड हो तो भवन के स्वामी की द्वितीय संतान दुःखी है, इसे हटाकर इस जगह पर रसोई बनानी चाहिए।

भवन के दक्षिणभाग में अधिक खाली जगह नही होनी चाहिए। यदि खाली जगह छोड़नी हो तो उत्तर-पूर्व दिशा में छोड़नी चाहिए।

भवन के मुख्य द्वार पर यदि कोई अवरोध हो तो जैसे पेड़, बिजली-टेलीफोन का खम्बा आदि से दाम्पत्य जीवन में मुष्किलें आती हैं। ये अवरोध हटाकर या पकुआ मिर्र लगाकर इस को दूर किया जा सकता है।

भवन में दक्षिर्-िपष्चिम कोने को भारी व ऊँचा रखा जाना चाहिए।

घर का मुख्य द्वार अन्य सभी दरवाजों से बड़ा होना चाहिए। दरवाजा वर्गाकार नही होना चाहिए।

घर का दक्षिर्-िपष्चिम दिशा के भाग में कभी किसी प्रकार का गड्ढा न बनायें।

घर के प्रवे्य द्वार को अन्य द्वारों की अपेक्षा बड़ा बनायें और घर के एक सीध में तीन दरवाजें नही बनाने चाहिए।

दक्षिण दिशा वाला मकान या निवास परिवार के लिए अशुभ नही माना जाता इसलिए दक्षिर्-िमुखी मकान में निवास न करें।

घर के मुख्यद्वार के सामने सीढ़ियाँ न बनायें, सीढ़ियांँ गिनती में 5,7,11,13,17,21 होनी चाहिए।
सीढियों के नीचे बाथरूम, मन्दिर, रसोई और स्टोर नही बनाना चाहिए।

घर के मुखिया का शयनकक्ष दक्षिर्-िपष्चिम में होना उचित माना गया है।

मकान का मध्य स्थल हमेशा खाली व साफ सुथरा रखें। मकान टी. जंक्शन पर नही होना चाहिए।

घर का दक्षिण पूर्व कोण को आग्नेय कोण कहा जाता है इसलिए जनरेटर, ट्रांसफार्मर, मोटर आदि विद्युत उपकरण इस दिशा में लगाना उचित माना जाता है।

पानी की टंकी के लिए छत पर पष्चिम दिशा या उत्तर-पष्चिम दिशा को ही उचित माना जाता है।

मकान की छत पर घर के कबाड़ को नही रखना चाहिए छत हमेशा साफ सुथरी रखनी चाहिए।

शयनकक्ष में पलंग की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि सोने वाले का सिर दक्षिण एवं पैर उत्तर दिशा की तरफ हो। शयनकक्ष में आइना इस स्थिति में न हो कि सोने वाले व्यक्ति का कोई भी अंग दिखाई पड़े।

घर में दर्पण को लगाते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। दर्पण के लिए हमेशा उत्तर-पूर्व, उत्तर, पूर्व दिशा को ही उत्तम माना गया है। घर का भारी सामान जैसे अलमारी, संदूक जैसी भारी वस्तुओं के लिए दक्षिण व पष्चिम दिशा का स्थान उचित है।

रसोईघर की व्यवस्था दक्षिर्-िपूर्व में करें तो उचित है। खाना पकाते समय कोण को पूर्व की तरफ मुख करके खाना बनाना चाहिए।

पूजा घर के लिए उत्तर पूर्व दिशा का स्थान सर्वोत्तम माना गया है।

मेहमानों के ठहरने की व्यवस्था वायव्य दिशा(उत्तर-पष्चिम) में करनी चाहिए। इसी कोण में लड़कियों के सोने की व्यवस्था होनी चाहिए जो विवाह योग्य हो।

दुकान के लिए चुने गये भवन के ई्यान कोने को खाली रखें और यहाँ पर स्वच्छता का ध्यान दें।

जूते या भारी समान के कार्टून या और सामान ई्यान कोण में रखें जहाँ तक हो सके इस प्रकार का सामान दक्षिण अथवा पष्चिम दिशा में रखना चाहिए।

दुकान में तराजू दक्षिण दीवार के सामने स्टैण्ड पर रखें।

दुकान में अलमारी, शो-केस, फर्नीचर पष्चिम या नैत्र्रचत्य योग में बनवायें, पूर्व उत्तर क्षेत्र ग्राहको कें आने जाने के लिए चाहिए।

दुकान में माला का भण्डारण दक्षिण पष्चिम अथवा नैत्र्रचत्य में करना चाहिए।

बिजली का मीटर, स्विचबोर्ड आदि आग्नेय कोण में ही रखना चाहिए।

दुकान के अंदर दुहरी छत आदि बनवाऐं तो दक्षिण या पष्चिम क्षेत्र में ही बनवाऐं, उत्तर पूर्व क्षेत्र को खाली रखें।

दुकान में सीढ़ियाँ बनवानी हो तो वह ई्यान कोण को छोड़कर अन्य स्थान में बनवाऐं।

अगर दोहरे शटर वाला पूर्वोन्मुखी दुकान में दोनो शटरों को खोल पाना संभव न हो और एक ही शटर खोल पाना संभव हो तो ई्यान कोण की ओर वाला शटर खुला रखें, आग्नेय कोण की ओर वाला शटर बंद ही रखना चाहिए।

दक्षिणन्मुखी दुकानों में वायव्य की ओर को खुला रखें और नैत्र्रचत्य की ओर का बंद रखना चाहिए, और इसका उल्टा कभी नही करना चाहिए।

पानी का स्थान ई्यान कोण में बनायें।

यदि दुकान में वर्क्याप बनाई जाती है और आप म्यीनों का व्यापार करते है, तो म्यीन आदि दक्षिण अथवा नैत्र्रचत्य कोण में रखनी चाहिए।

पूर्वोन्मुखी दुकान में सड़क से दुकान पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ ई्यान कोण में बनायें या सीढ़ियाँ इस प्रकार बनवायें कि वे पूर्व में दुकान के सामने पूरी पंक्ति में आ जायें।

पष्चिमोंन्मुखी दुकान में सड़क से दुकान पर चड़ने के लिए सीढ़ियां पष्चिमी-वायव्य कोण में बनायें।

इनके बीच अर्धचंद्राकार सीढियाँ भी बनवाई जा सकती है। परन्तु नैत्रचत्य कोण में सीढ़ियाँ कदापि न बनवायें।

दक्षिणमुखी दुकान में सड़क से दुकान पर चढ़नें के लिए ये सीढ़ियाँ दक्षिणी आग्नेय कोण में बनवाऐं। बीचो बीच अर्ध चंद्राकार सीढ़ियाँ भी बनवाई जा सकती हैं। दक्षिण नैत्र्रचत्य कोण में सीढ़ीयां नही बनवाऐं, क्योंकि नैत्र्रचत्य कोण  की ओर से आना जाना वास्तुसम्मत नही हैं।

उत्तरोन्मुखी दुकान में सड़क से दुकान पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ उसके उत्तर ई्यान कोण में बनवाऐं, सीढ़ियाँ वायव्य कोण से ई्यान कोण तक पूरे भाग में भी बनवाई जाती है।

यदि आपकी दुकान में पूर्व या उत्तर दिशा में भी शेल्फें है तो इन शेल्फों में अन्य की अपेक्षा कम सामान रखें।

घर के मुख्य द्वार पर तांबे का पात्र लगाने से घर में सभी स्वस्थ्य रहते हैं।

घर में सभी घड़ी चालू हालत में रखनी चाहिए। रूकने से वहाँ रहने वालों के काम में रूकावटें आती हैं।

अपने घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें जो 9 अंगुल लंबा और 9 अंगुल चैड़ा हो उससे वास्तुदोष में न्यूनता आती है।

यदि घर में वास्तुदोष लग रहा है। तो उत्तर-ददक्षिण इंट्री दो तो एक तार चाँदी का हो उसे अपने द्वार के नीचे दबाऐं। इससे लाभ प्राप्त होगा।

व्यवसाय वृद्धि के लिए दक्षिण दीवार पर दौड़ते हुए घोड़े का सुंदर चित्र लगायें इससे व्यवसाय में वृद्धि होगी।

अपने व्यवसाय में सफलता पाने के लिए जरूरी है कि हमारे कार्यालय में बैठने की अवस्था सही हो, हमें अपने व्यवसाय स्थल पर इस प्रकार बैठना चाहिए कि बैठते समय हमारा मुँह उत्तर या पूर्व की ओर हो ध्यान रहे कि हमारी पीठ के पीछे कोई खिड़की न हो बल्कि एक ठोस दीवार हो।

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